आओ मिलकर बनाएं एक विचारों का घर।


आओ मिलकर बनाएं एक विचारों का घर

सामाजिक विचारों की लड़ी से, एक नई रुपरेखा तैयार होती है जो कि समाज में उजाग्रता का   उदाहरण बनती हैं। अगर सभी व्यक्ति अपने आप तक ही सीमित रहेंगे, तो सामाजिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिये कौन जिम्मेदारी लेगा। “मैं तो जरूर इस जिम्मेदारी का भार अपने सिर पर उठाना पसन्द करूँगा” और यह मेरे लिये सौभाग्य की बात होगी। मन में उठते हुए सवाल सही दिशा निर्देश भी देते हैं तो गलत रास्ते पर भी ले जाते हैं। महसूस करना तो इन्सान का फ़र्ज़ है। सभी लोगों के विचारों से बड़ी से बड़ी मुसीबत का हल निकाला जा सकता है परन्तु यह बात लिखने, पढ़ने और आपस में बातें करने तक ही सीमित है। मैं आपको विस्वास दिलाना चाहता हूँ! कि मैं इस विचारधारा के साथ चलना चाहता हूँ! क्या आप मेरे साथ चलना चाहते हैं! पूछिए अपने आप से क्या आप अपने तक ही सीमित हैं। मैं कहता हूँ अगर आप अपने तक ही सीमित हैं तो घर नहीं बनेगा, प्रदेश नहीं बनेगा और देश भी नहीं बनेगा।

अगर कोई एक व्यक्ति ये कहता है कि चलो मेरे साथ, और हमें किसी सड़क की सफ़ाई करनी है तो कोई दूसरा कहता है छोड़ो ये हमारा काम नहीं या कहता है फिर कभी कर लेंगे। ये है आलस्य, काम से जी चुराना, इरादा पका नहीं, अपने तक ही सीमित रहना।



अगर महात्मा गाँधी और सुभाष चन्द्र वोष अपने तक ही सीमित रहते तो शायद मैं आज ये सब ना लिखता। अगर मुझे और आप सभी को एक दूसरे के साथ अपने विचारों का आदान प्रदान करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है तो अब आप सबकी क्या राय है, मैं आपसे क्या उम्मीद कर सकता हूँ।

Keywords: Social ideas fought, New Profile, Encourage social activities, Guidelines, Wrong Way

पव्लिशर “जितेंदर शर्मा

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Review For आओ मिलकर बनाएं एक विचारों का घर।

सामाजिक विचारों की लड़ी से, एक नई रुपरेखा तैयार होती है जो कि समाज में उजाग्रता का उदाहरण बनती हैं। अगर सभी व्यक्ति अपने आप तक ही सीमित रहेंगे, तो सामाजिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिये कौन जिम्मेदारी लेगा। "मैं तो जरूर इस जिम्मेदारी का भार अपने सिर पर उठाना पसन्द करूँगा" और यह मेरे लिये सौभाग्य की बात होगी। मन में उठते हुए सवाल सही दिशा निर्देश भी देते हैं तो गलत रास्ते पर भी ले जाते हैं। महसूस करना तो इन्सान का फ़र्ज़ है। सभी लोगों के विचारों से बड़ी से बड़ी मुसीबत का हल निकाला जा सकता है परन्तु यह बात लिखने, पढ़ने और आपस में बातें करने तक ही सीमित है। मैं आपको विस्वास दिलाना चाहता हूँ! कि मैं इस विचारधारा के साथ चलना चाहता हूँ! क्या आप मेरे साथ चलना चाहते हैं! पूछिए अपने आप से क्या आप अपने तक ही सीमित हैं। मैं कहता हूँ अगर आप अपने तक ही सीमित हैं तो घर नहीं बनेगा, प्रदेश नहीं बनेगा और देश भी नहीं बनेगा।

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